प्रिय मित्रों आपके के उत्साहवर्धन का आभारी हूँ..

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

मनुष्य - परिष्कृत सृजन !


                   मनुष्य - परिष्कृत सृजन !

                           सत्य ने ओढ़  लिया 
                           असत्य का आवरण।
                             भोग की इच्छा,
                          भौतिकता की लालसा,
                   धन का लोभ,
                     मनुष्य नहीं कर सका संवरण।
                  करने लगा अंधकार में विचरण।

                                 प्रतिपल,  
                                  प्रतिक्षण,
                        हो रहा है ,एक  द्रौपदी का
                                 चीरहरण! 
                          सत्य ने ओढ़  लिया,
                             असत्य का आवरण।

                       बदल गयी हैं  परिभाषाएं,
                           मान्यताए!
                      बदला बदला सा है,
                       मनुष्य का आचरण!
                        प्रकाश को छोड़ उसने 
                           तिमिर का,
                           कर लिया,
                          वरण!
                     इश्वर भी आश्चर्य में हैं,
                  देखकर अपना परिष्कृत सृजन 
  
                         धर्मं शरणम गच्छामि।
                      ब्रम्हं शरणम गच्छामि।
                              को छोड़कर,
                        मनुष्य ने  ले ली है
                           पाप और हिंसा
                       की शरण।
                         चंद्रमा हो या पृथ्वी,
                  जहाँ  भी पडे मनुष्य के चरण,
                              वह है हुआ,
                          अन्याय अत्याचार
                                  भीषण...      
                  सत्य ने ओढ़  लिया 
                         असत्य का आवरण।
                 सृष्टिकर्ता की जगह पाने को,
                      प्रकृति को झुठलाने को,
                         कर रहा है मनुष्य,
                   विभिन्न ग्रहों का विचरण!
          क्या यही है इश्वर का परिष्कृत सृजन...
          क्या यही है इश्वर का परिष्कृत सृजन????




रविवार, 5 फरवरी 2012

क्या जंग लगी तलवारों में, जो इतने दुर्दिन सहते हो





क्या जंग लगी तलवारों में, जो इतने दुर्दिन सहते होI
राणा  प्रताप के वंशज हो,क्यों कुल को कलंकित करते होII
आराध्य तुम्हारे राम-कृष्ण,जो कर्म की राह दिखाते थेI
जो दुश्मन हो आततायी, वो चक्र सुदर्शन उठाते थेI
श्री राम ने रावण को मारा, तुम गद्दारों से डरते होII
जब शस्त्रों से परहेज तुम्हे,तो राम राम क्यों जपते होI
क्या जंग लगी तलवारों में,जो इतने दुर्दिन सहते होII    
  
अंग्रेजों ने दौलत लूटी,मुगलों ने थी इज्जत  लूटी I
दौलत लूटी, इज्जत लूटी, क्या खुद्दारी भी लूट लिया,
गिद्धों ने माँ को नोंच लिया,तुम शांति शांति को जपते होI
इस भगत सुभाष की धरती पर,क्यों नामर्दों से रहते हो?
क्या जंग लगी तलवारों में जो इतने दुर्दिन सहते होII                                                                                                      

हिन्दू हो,कुछ प्रतिकार करो,तुम भारत माँ के क्रंदन काI
यह समय नहीं है, शांति पाठ और गाँधी के अभिनन्दन काII
यह समय है शस्त्र उठाने का,गद्दारों को समझाने का,
शत्रु पक्ष की धरती पर,फिर शिव तांडव दिखलाने काII
इन जेहादी जयचंदों की घर में ही कब्र बनाने का,
यह समय है हर एक हिन्दू के,राणा प्रताप बन जाने काI
इस हिन्दुस्थान की धरती पर ,फिर भगवा ध्वज फहराने काII

ये नहीं शोभता है तुमको,जो कायर सी फरियाद करोI
छोड़ो अब ये प्रेमालिंगन,कुछ पौरुष की भी बात करोII
इस हिन्दुस्थान की धरती के,उस भगत सिंह को याद करो,
वो बन्दूको को बोते थे,तुम तलवारों से डरते होI
क्या जंग लगी तलवारों में जो इतने दुर्दिन सहते होII




बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

प्राची की तलाश...


           ये कविता गुरुदेव दीपक बाबा और  उनकी काल्पनिक नायिका 
                                      प्राची  के चरणों में समर्पित है.. 
                                                


मन क्यों उदास है??
शायद इसे किसी की तलाश है!
ये जानता है वो है इससे बहुत दूर,
फिर भी ढूंढता  उसे अपने आस पास है|
मन क्यों उदास है???

                   
शायद ये तलाश मे है उस परछाई के….
                    
जिसे इसके आस्तित्व पर ही अविश्वाश है|
                   
शायद इसे अपनी मुट्ठी मे ,
                   
सूखी रेत को बंद करने की आस है|
                   
मन क्यों उदास है????
वो कही नहीं है,
इसे इसका एहसास है.
फिर भी वो मिलेगा इसे,
इसे इसका विश्वास है|
मन क्यों उदास है???






शुक्रवार, 16 दिसम्बर 2011

एकाकी रिश्ते

इन रिश्तो के अनुबंधों में,जब एकाकी हो जाता हूँ,
जब अपनी ही परछाई को,खुद से ही उलझता पाता हूँ
तब जीवन जीने की इच्छा,कुछ और प्रबल हो जाती है.
जब अपनी ही खुद की छाया, खुद से ही बड़ी में पाता हूँ
इन रिश्तो के अनुबंधों में,जब एकाकी हो जाता हूँ

ये रिश्ते तो ऋतुओं जैसे,झट पतझड़ में मुरझाते हैं,
जो जीवन में हो ऋतु बसंत,ये प्रेम पुष्प बिखराते हैं
इस हार जीत के रिश्तों में,जब पीछे में रह जाता हूँ,
कही दूर किसी कोने में जा,खुद की ही ऋचाएं गाता हूँ
इन रिश्तो के अनुबंधों में,जब एकाकी हो जाता हूँ

कुछ लिखूं बोलू या मूक रहूँ,इन रिश्तों का क्या रूप कहूँ??
रिश्तों के इस अवशेषी घट को,मैं हार कहूँ या जीत कहूँ??
जब जाह्न्वी के तट पर बैठा,इस घट को डुबोने जाता हूँ,
तब मोक्ष प्राप्ति की ये इच्छा,कुछ धुंधली सी हो जाती है,
मैं  नैनों के इस जलधि प्रवाह को,रोक नहीं फिर पाता हूँ,
इस घट को माथे से ही लगा,अपना प्रणाम पहुचता हूँ
इन रिश्तों के अनुबंधों में,जब एकाकी हो जाता हूँ

बृहस्पतिवार, 10 नवम्बर 2011

मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ

मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ                    
मैं  सर्व धर्म समभाव सिखाता ..
मानवता की बात बताता,
हर धर्मस्थल पर शीश नवाता,आतंकी हूँ...
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ...
वो धरा गोधरा की हो या,
वो जनमभूमि हो राम की. 
हो मथुरा काशी की धरती,
या सोमनाथ के धाम की..
हर बार में अपनी बलि चढ़ाता आतंकी हूँ
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ.....

मैं सत्य अहिंसा के दर्शन को ,
जीने का आधार बनता 
बाबर अब्दाली के वंशज को भी,
मैं  अपने गले लगाता
नित नए नए अत्याचारों पर,
धैर्य दिखता,सहता जाता आतंकी हूँ..
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं आतंकी हूँ                                         

पर बहुत हो चुकी धैर्य परीक्षा, 
अब चन्दन अनल दिखायेगा.
भाई भाई के नारे को,
अब फिर से परखा जायेगा.
गर भाई हो कौरव जैसा, 
तो अर्जुन शस्त्र उठाएगा..

गाँधी का ये गाँधी दर्शन,
अब चक्र सुदर्शन लायेगा.
डंडे वाला बूढ़ा गाँधी ,
अब सावरकर बन जायेगा.
शत वर्षों से सहते आये,
अब और नहीं सहा जायेगा.
अब हिन्दुस्थान का हर हिन्दू,
राणा प्रताप बन जायेगा.  

तब बाबर की जेहादी सेना में,   
उथल पुथल हो जाएगी.
गुजरात की कुछ बीती यादें, 
फिर से दोहराई जाएँगी.
जौहर की बाते बीत गयी,
अब चंडी शस्त्र उठाएगी
गर हुआ जरुरी तो बहने,
प्रज्ञा ठाकुर बन जाएँगी.....

पर पांडव ने भी कौरव को,
अंतिम सन्देश सुनाया था.
खुद योगेश्वर ने जाकर भी,
दुर्योधन को समझाया था.                                            
तुम हिंसक आतातायी हो,
तुम कौरव हो पर भाई हो.
यदि जीना है तो जीने दो,
या मरने को तैयार रहो..
ये बात सभी को समझाता मैं आतंकी हूँ
मैं हिन्दुस्थान का हिन्दू हूँ,मैं  आतंकी हूँ.....