गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

पापी

तुम्हारा नाम कविता में जो लिखता हूँ ,
तो मैं पापी…
तेरी यादों को अपना मान लेता हूँ
तो मैं पापी…
कभी तुझको भुलाता हूँ,कभी तुझको बुलाता हूँ…
भुलाता हूँ तो मैं पापी….
बुलाता हूँ तो मैं पापी…….


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मैं हूँ मजदूर,
पत्थर तोड़ के मैं घर चलाता हूँ..
कभी मंदिर की पौढ़ी पर भी,जा के बैठ जाता हूँ..
पढ़ा था धर्मग्रंथों में,प्रभु के सत्य की महिमा
मेरा सच है मेरी बच्ची,
जो भूखे पेट सोयी है….
मैं सच बोलू तो मैं पापी,मैं ना बोलू तो हूँ पापी…..


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1 टिप्पणी:

  1. ashu ji...

    kya baat ek sawal par aapne hi sawal khade kar diye... magar theek hai shayad aap apne aap se sawal kar rahe ho.. or yeh bahut badiya baat hai... kyuki kisi or se sawal karne se behtar hai apne aap se sawal kare jaye..

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