गुरुवार, 4 अगस्त 2011

एकाकीपन


कुछ व्यस्तता और व्यक्तिगत कारणों से कई दिनों तक ब्लॉग पर आना नहीं हुआ...१० साल पहले लिखी इस कविता को आज भी अपने करीब पाता हूँ..

                   एकाकीपन के साये में ,घुटता रहता हूँ  मैं  अक्सर
                   भीड़ भरे बाजारों में  भी, तन्हा रहता हूँ  मैं  अक्सर|
तन्हाई क्या होती है,ये मेरा मन कहता है अक्सर..
           नक्षत्रों के मध्य चंद्रमा,जैसे छिपकर रहता अक्सर|

           मेरे अपने मुझको अपना, कहते भी रहते है अक्सर..
            किन्तु समय की अग्नि परीक्षा, में उनका मिलना है दुष्कर|
भीड़ भरे बाजारों मै भी तन्हा रहता हूँ  मै अक्सर|

तन्हाई के आलम में,मै सोचा करता हूँ  अक्सर..
क्या जुर्मं है उस तारे का,
जिसने देखा नहीं सवेरा, दूर गगन की छाँव में रहकर?

कभी कभी ये तन्हाई,जीना कर देती इतना दुष्कर..
किसी शांत निर्जन कोने में,अश्रु बहता हूँ घुट घुट कर |

     मन की ब्यथा कभी कभी,रुक जाती है आ के अधरों पर.
क्योंकि मेरी तन्हाई पर,हँसने वाले मिलते अक्सर|

एकाकीपन के साये मेघुटता  रहता हूँ मै अक्सर
भीड़ भरे बाजारों मै भी, तन्हा रहता हूँ मै अक्सर|



6 टिप्‍पणियां:

  1. आशु भाई महादेवी जी के "आंसू' पुस्तक की याद दिला दी आप ने
    आप की काव्य प्रतिभा को प्रणाम
    यही अंतिम सत्य है की एकाकी आना और एकाकी जाना

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  2. @घुटता रहता हूँ मैं अक्सर…

    sundr kavita... ekakipan bahut darata hai na

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